गुरुवार, 13 नवंबर 2014

साधु की सीख


किसी गाँव मे एक साधु
रहा करता था ,वो जब
भी नाचता तो बारिस होती थी .
अतः गाव के लोगों को जब भी बारिस
की जरूरत होती थी ,तो वे लोग साधु के
पास जाते और उनसे अनुरोध करते की वे
नाचे , और जब वो नाचने लगता तो बारिस
ज़रूर होती.
कुछ दिनों बाद चार लड़के शहर से गाँव में घूमने
आये, जब उन्हें यह बात मालूम हुई
की किसी साधू के नाचने से बारिस होती है
तो उन्हें यकीन नहीं हुआ .
शहरी पढाई लिखाई के घमंड में उन्होंने गाँव
वालों को चुनौती दे दी कि हम भी नाचेंगे
तो बारिस होगी और अगर हमारे नाचने से
नहीं हुई तो उस साधु के नाचने से
भी नहीं होगी.फिर क्या था अगले दिन
सुबह-सुबह ही गाँव वाले उन लड़कों को लेकर
साधु की कुटिया पर पहुंचे.
साधु को सारी बात बताई गयी , फिर
लड़कों ने नाचना शुरू किया , आधे घंटे बीते
और पहला लड़का थक कर बैठ गया पर बादल
नहीं दिखे , कुछ देर में दूसरे ने
भी यही किया और एक घंटा बीतते-बीतते
बाकी दोनों लड़के भी थक कर बैठ गए, पर
बारिश नहीं हुई.
अब साधु की बारी थी , उसने नाचना शुरू
किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई,
साधु नाचता रहा …दो घंटा बीता बारिश
नहीं हुई….पर साधु तो रुकने का नाम
ही नहीं ले रहा था ,धीरे-धीरे शाम ढलने
लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहत सुनाई
दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी . लड़के
दंग रह गए
और तुरंत साधु से क्षमा मांगी और पूछा-
” बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे
नाचने से बारिस नहीं हुई और आपके नाचने से
हो गयी ?”
साधु ने उत्तर दिया – ” जब मैं नाचता हूँ
तो दो बातों का ध्यान रखता हूँ ,
पहली बात मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैं
नाचूँगा तो बारिस
को होना ही पड़ेगा और दूसरी ये कि मैं तब
तक नाचूँगा जब तक कि बारिस न
हो जाये .”
Friends सफलता पाने वालों में यही गुण
विद्यमान होता है वो जिस चीज को करते
हैं उसमे उन्हें सफल होने का पूरा यकीन
होता है और वे तब तक उस चीज को करते हैं
जब तक कि उसमे सफल ना हो जाएं. इसलिए
यदि हमें सफलता हांसिल करनी है तो उस
साधु की तरह ही अपने लक्ष्य को प्राप्त
करना होगा.

साधू की झोपड़ी

किसी गाँव
में दो साधू
रहते थे. वे
दिन भर
भीख मांगते
और मंदिर में
पूजा करते
थे। एक दिन
गाँव में
आंधी आ
गयी और बहुत जोरों की बारिश होने लगी;
दोनों साधू गाँव की सीमा से लगी एक
झोपडी में निवास करते थे, शाम को जब
दोनों वापस पहुंचे तो देखा कि आंधी-तूफ़ान
के कारण उनकी आधी झोपडी टूट गई है। यह
देखकर पहला साधू क्रोधित हो उठता है और
बुदबुदाने लगता है ,” भगवान तू मेरे साथ
हमेशा ही गलत करता है… में दिन भर
तेरा नाम लेता हूँ , मंदिर में
तेरी पूजा करता हूँ फिर भी तूने
मेरी झोपडी तोड़ दी… गाँव में चोर – लुटेरे
झूठे लोगो के तो मकानों को कुछ नहीं हुआ ,
बिचारे हम साधुओं की झोपडी ही तूने तोड़
दी ये तेरा ही काम है …हम तेरा नाम जपते हैं
पर तू हमसे प्रेम नहीं करता….”
तभी दूसरा साधू आता है और
झोपडी को देखकर खुश हो जाता है नाचने
लगता है और कहता है भगवान् आज विश्वास
हो गया तू हमसे कितना प्रेम करता है ये
हमारी आधी झोपडी तूने ही बचाई
होगी वर्ना इतनी तेज आंधी – तूफ़ान में
तो पूरी झोपडी ही उड़ जाती ये
तेरी ही कृपा है कि अभी भी हमारे पास सर
ढंकने को जगह है…. निश्चित ही ये
मेरी पूजा का फल है , कल से मैं तेरी और
पूजा करूँगा , मेरा तुझपर विश्वास अब और
भी बढ़ गया है… तेरी जय हो !
मित्रों एक ही घटना को एक ही जैसे
दो लोगों ने कितने अलग-अलग ढंग से देखा …
हमारी सोच हमारा भविष्य तय करती है ,
हमारी दुनिया तभी बदलेगी जब
हमारी सोच बदलेगी। यदि हमारी सोच पहले
वाले साधू की तरह होगी तो हमें हर चीज में
कमी ही नजर आएगी और अगर दूसरे साधू
की तरह होगी तो हमे हर चीज में अच्छाई
दिखेगी ….अतः हमें दूसरे साधू की तरह विकट
से विकट परिस्थिति में भी अपनी सोच
सकारात्मक बनाये रखनी चाहिए।

तीन साधू

एक औरत अपने घर से निकली , उसने घर के
सामने सफ़ेद लम्बी दाढ़ी में तीन साधू-
महात्माओं को बैठे देखा . वह
उन्हें
पहचान
नही पायी .
उसने कहा , ” मैं आप
लोगों को नहीं पहचानती , बताइए
क्या काम है ?”
” हमें भोजन करना है .”, साधुओं ने बोला .
” ठीक है ! कृपया मेरे घर में पधारिये और
भोजन ग्रहण कीजिये .”
” क्या तुम्हारा पति घर में है ?” , एक साधू ने
प्रश्न किया .
“नहीं, वह कुछ देर के लिए बाहर गए हैं .” औरत
ने उत्तर दिया .
” तब हम अन्दर नहीं आ सकते “, तीनो एक
साथ बोले .
थोड़ी देर में पति घर वापस आ गया , उसे
साधुओं के बारे में पता चला तो उसने तुरंत
अपनी पत्नी से उन्हें पुन: आमंत्रित करने के
लिए कहा।औरत ने ऐसा ही किया , वह
साधुओं के समक्ष गयी और बोली,” जी, अब
मेरे पति वापस आ गए हैं , कृपया आप लोग घर
में प्रवेश करिए !”
” हम किसी घर में एक साथ प्रवेश नहीं करते .”
साधुओं ने स्त्री को बताया .
” ऐसा क्यों है ?” औरत ने अचरज से पूछा .
जवाब में मध्य में खड़े साधू ने बोला ,”
पुत्री मेरी दायीं तरफ खड़े साधू का नाम
‘धन’ और बायीं तरफ खड़े साधू का नाम
‘सफलता’ है , और मेरा नाम ‘प्रेम’ है . अब
जाओ और अपने पति से विचार-विमर्श कर
के बताओ की तुम हम तीनो में से किसे
बुलाना चाहती हो।”
औरत अन्दर गयी और अपने पति से
सारी बात बता दी . पति बेहद खुश
हो गया . ” वाह , आनंद आ गया ,
चलो जल्दी से ‘धन’ को बुला लेते हैं , उसके
आने से हमारा घर धन-दौलत से भर जाएगा ,
और फिर कभी पैसों की कमी नहीं होगी .”
औरत बोली ,” क्यों न हम
सफलता को बुला लें , उसके आने से हम
जो करेंगे वो सही होगा , और हम देखते-देखते
धन-दौलत के मालिक भी बन जायेंगे .”
“हम्म , तुम्हारी बात भी सही है , पर इसमें
मेहनत करनी पड़ेगी , मुझे तो लगता ही धन
को ही बुला लेते हैं .” , पति बोला .
थोड़ी देर उनकी बहस चलती रही पर
वो किसी निश्चय पर नहीं पहुच पाए , और
अंतत: निश्चय किया कि वह साधुओं से यह
कहेंगे कि धन और सफलता में जो आना चाहे
आ जाये।
औरत झट से बाहर गयी और उसने यह आग्रह
साधुओं के सामने दोहरा दिया .
उसकी बात सुनकर साधुओं ने एक दूसरे
की तरफ देखा और बिना कुछ कहे घर से दूर
जाने लगे।
” अरे ! आप लोग इस तरह वापस क्यों जा रहे
हैं ?” , औरत ने उन्हें रोकते हुए पूछा .
” पुत्री ,दरअसल हम तीनो साधू इसी तरह
द्वार-द्वार जाते हैं , और हर घर में प्रवेश करने
का प्रयास करते हैं , जो व्यक्ति लालच में
आकर धन या सफलता को बुलाता है हम
वहां से लौट जाते हैं , और जो अपने घर में
प्रेम का वास चाहता है उसके यहाँ बारी-
बारी से हम दोनों भी प्रवेश कर जाते हैं .
इसलिए इतना याद रखना कि जहाँ प्रेम है
वहां धन और
सफलता की कमी नहीं होती ।”, ऐसा कहते
हुए धन और सफलता नामक साधुओं ने
अपनी बात पूर्ण की .

सोमवार, 10 नवंबर 2014

जानें हिंदू संस्कार

।ॐ। 'संस्कार' शब्द का अधिक उपयुक्त पर्याय
अंग्रेजी का 'सेक्रामेंट' शब्द हो सकता है।
संस्कार का सामान्य अर्थ है-किसी को संस्कृत
करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना। किसी साधारण
या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम
बना देना ही उसका संस्कार है।
इसी तरह किसी साधारण मनुष्य
को विशेष प्रकार की धार्मिक क्रिया-प्रक्रियाओं
द्वारा श्रेष्ठ बनाना ही सुसंस्कृत
करना कहा जाता है।
संस्कृत भाषा का शब्द है संस्कार। मन, वचन, कर्म और
शरीर को पवित्र करना ही संस्कार
है। हमारी सारी प्रवृतियों और
चित्तवृत्तियों का संप्रेरक हमारे मन में पलने वाला संस्कार
होता है। संस्कार से ही हमारा सामाजिक और
आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम
सभ्य कहलाते हैं। व्यक्तित्व निर्माण में हिन्दू
संस्कारों की महत्वपूर्ण
भूमिका होती है। संस्कार विरुद्ध आचरण
असभ्यता की निशानी है। 'संस्कार'
मनुष्य को पाप और अज्ञान से दूर रखकर आचार-विचार और
ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं।
मुख्यत: तीन भागों में विभाजित
संस्कारों को क्रमबद्ध सोलह संस्कार में विभाजित
किया जा सकता है। ये तीन प्रकार होते हैं'- (1)
मलापनयन, (2) अतिशयाधान और (3) न्यूनांगपूरक।
(1)
मलापनयन : उदाहरणार्थ किसी दर्पण आदि पर
पड़ी हुए धूल, मल
या गंदगी को पोंछना, हटाना या स्वच्छ
करना 'मलापनयन' कहलाता है।
(2)
अतिशयाधान : किसी रंग या पदार्थ
द्वारा उसी दर्पण को विशेष रूप से प्रकाशमय
बनाना या चमकाना ‘अतिशयाधान’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में
इसे भावना, प्रतियत्न या गुणाधान-संस्कार
भी कहा जाता है।
(3)
न्यूनांगपूरक : अनाज के भोज्य पदार्थ बन जाने पर दाल, शाक,
घृत आदि वस्तुएँ अलग से लाकर मिलाई जाती हैं।
उसके हीन
अंगों की पूर्ति की जाती हैं,
जिससे वह अनाज रुचिकर और पौष्टिक बन सके। इस
तृतीय संस्कार को न्यूनांगपूरक संस्कार कहते हैं।
अतः गर्भस्थ शिशु से लेकर मृत्युपर्यंत जीव के
मलों का शोधन, सफाई आदि कार्य विशिष्ट विधिक क्रियाओं व
मंत्रों से करने को 'संस्कार' कहा जाता है। हिंदू धर्म में
सोलह संस्कारों का बहुत महत्व है। वेद, स्मृति और
पुराणों में अनेकों संस्कार बताए गए है किंतु धर्मज्ञों के
अनुसार उनमें से मुख्य सोलह संस्कारों में ही सारे
संस्कार सिमट जाते हैं अत: इन संस्कारों के नाम है-
(1)
गर्भाधान संस्कार, (2)पुंसवन संस्कार,
(3)सीमन्तोन्नयन संस्कार, (4)जातकर्म संस्कार,
(5)नामकरण संस्कार, (6)निष्क्रमण संस्कार,
(7)अन्नप्राशन संस्कार, (8)मुंडन संस्कार, (9)कर्णवेधन
संस्कार, (10)विद्यारंभ संस्कार, (11)उपनयन संस्कार,
(12)वेदारंभ संस्कार, (13)केशांत संस्कार, (14)सम्वर्तन
संस्कार, (15)विवाह संस्कार और (16)अन्त्येष्टि संस्कार।
संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों हैं
जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का योग्य सदस्य
बनाकर उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र
करें। संस्कार ही मनुष्य
को सभ्यता का हिस्सा बनाए रखते हैं। लेकिन वर्तमान में
हिंदुजन उक्त सोलह संस्कार मनमाने तरीके से
करके मत भिन्नता का परिचय देते हैं, जो कि वेद विरुद्ध है।
वेदों के अलावा गृहसूत्रों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है।
स्मृति और पुराणों में इसके बारे में विस्तृत
जानकारी मिलती है। वेदज्ञों अनुसार
गर्भस्थ शिशु से लेकर मृत्युपर्यंत जीव के
मलों का शोधन, सफाई आदि कार्य को विशिष्ट विधि व मंत्रों से
करने को 'संस्कार' कहा जाता है। यह इसलिए आवश्यक है
कि व्यक्ति जब शरीर त्याग करे
तो सद्गति को प्राप्त हो।
कर्म के संस्कार : हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र
यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट
होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-
जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह
सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के
शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। ये संस्कार मनुष्य
के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते,
अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और
वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म
शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य
का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है।
बालक के गर्भधारण
की परिस्थितियाँ भी इन पर प्रभाव
डालती हैं।
ये 'संस्कार' ही प्रत्येक जन्म में
संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे
कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है।
इसे 'संचित कर्म' कहते हैं। इन संचित कर्मों का कुछ भाग
एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है
और यही जीवन प्रेरणा का कार्य
करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने
जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है।
अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने
जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है। फिर इन
कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन
संस्कारों की एक अंतहीन
श्रृंखला बनती चली जाती है,
जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
उक्त संस्कारों के अलावा भी अनेकों संस्कार है
जो हमारी दिनचर्या और जीवन के
महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से जुड़े हुए हैं, जिन्हें
जानना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य माना गया है और जिससे
जीवन के रोग और शोक मिट जाते हैं
तथा शांति और समृद्धि का रास्ता खुलता है। यह संस्कार ऐसे
हैं जिसको निभाने से हम परम्परागत
व्यक्ति नहीं कहलाते बल्कि यह हमारे
जीवन को सुंदर बनाते हैं। ॐ।

नष्ट हो जाएंगे भारत के राजनीतिज


''
अपनी तुच्छ बुद्धि को ही शाश्वत
समझकर कुछ मूर्ख ईश्वर
की तथा धर्मग्रंथों की प्रामाणिकता मांगने
का दुस्साहस करेंगे इसका अर्थ है उनके पाप जोर मार रहे
हैं।''
WD
पुराणों में भारत में आज तक होने वाले
सभी शासकों की वंशावली का उल्लेख
मिलता है। पुराणकार
पुराणों की भविष्यवाणियों का अलग-अलग अर्थ
निकालते हैं। यहां प्रस्तुत हैं भागवत पुराण में दर्ज
भविष्यवाणी के अंश।
''
ज्यों-ज्यों घोर कलयुग आता जाएगा त्यों-त्यों सौराष्ट्र, अवंति,
अधीर, शूर, अर्बुद और मालव देश के
ब्राह्मणगण संस्कारशून्य हो जाएंगे तथा राजा लोग
भी शूद्रतुल्य हो जाएंगे।''
यहां शूद्र का मतलब उस आचरण से है, जो वेद विरुद्ध है।
मांस, मदिरा और संभोगादि प्रवृत्ति में ही सदा रत
रहने वाले राक्षसधर्मी को शूद्र कहा गया है।
जो ब्रह्म को मानने वाले हैं वही ब्राह्मण है।
आज की जनता ब्रह्म को छोड़कर
सभी को पूजने लगी है। जब
सभी वेदों को छोड़कर संस्कारशून्य हो जाएंगे
तब...
''
सिंधुतट, चंद्रभाग का तटवर्ती प्रदेश,
कौन्तीपुरी और कश्मीर
मंडल पर प्राय: शूद्रों का संस्कार ब्रह्मतेज से
हीन नाममात्र के द्विजों का और म्लेच्छों का राज
होगा। सबके सब राजा (राजनेता) आचार-विचार में म्लेच्छप्राय
होंगे। वे सब एक ही समय में भिन्न-भिन्न
प्रांतों में राज करेंगे।''

आप जानते हैं कि सिंधु के ज्यादातर
तटवर्ती इलाके अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गए
हैं। कुछ कश्मीर में हैं, जहां नाममात्र के द्विज
अर्थात ब्राह्मण हैं। इन सभी (म्लेच्छों) के बारे
में पुराणों में लिखा है कि... ''ये सबके सब परले सिरे के झूठे,
अधार्मिक और स्वल्प दान करने वाले होंगे।
छोटी बातों को लेकर ही ये क्रोध के मारे
आग-बबूला हो जाएंगे।''
अब आगे पढ़िए कश्मीर में ब्राह्मणों के साथ
जो हुआ, ''ये दुष्ट लोग स्त्री, बच्चों, गौओं और
ब्राह्मणों को मारने में
भी नहीं हिचकेंगे। दूसरे
की स्त्री और धन हथिया लेने में ये
सदा उत्सुक रहेंगे। न तो इन्हें बढ़ते देर
लगेगी और न घटते।
इनकी शक्ति और आयु
थोड़ी होगी। राजा के वेश में ये म्लेच्छ
ही होंगे।''
पूरे देश की यही हालत है अब
राजा (राजनेता) न तो क्षत्रित्व धारण करने वाले रहे और न
ही ब्राह्मणत्व। राजधर्म तो लगभग समाप्त
ही हो गया है तो ऐसी स्थिति में, ''वे
लूट-खसोटकर अपनी प्रजा का खून चूसेंगे। जब
ऐसा शासन होगा तो देश की प्रजा में
भी वैसा ही स्वभाव, आचरण, भाषण
की वृद्धि हो जाएगी। राजा लोग
तो उनका शोषण करेंगे ही, आपस में वे
भी एक-दूसरे को उत्पीड़ित करेंगे और
अंतत: सबके सब नष्ट हो जाएंगे।''
जब सब नष्ट हो जाएंगे तब क्या होगा...? इसके आगे
भी पुराणों में भविष्यवाणी कर
रखी है। पढ़ते रहिए वेबदुनिया.कॉम।

सावधान! धरती पर कब्जा करने आ रहे हैं 'एलियंस'

वर्षों के वैज्ञानिक शोध से यह पता चला कि 10 हजार
ई.पू. धरती पर एलियंस उतरे और उन्होंने पहले
इंसानी कबीले के सरदारों को ज्ञान दिया और फिर बाद में
उन्होंने राजाओं को अपना संदेश वाहक बनाया और अंतत:
उन्होंने इस तरह धरती पर कई प्रॉफेट पैदा कर दिए।

वे अलग-अलग काल में अलग-अलग धर्म-समाज
की रचना कर धरती के देवता या कहें कि फरिश्ते बन बैठे।
सचमुच इंसान उन्हें अपना देवता या फरिश्ता मानता है,
क्योंकि वे आकाश से उतरे थे और उन्हें सर्वप्रथम
आकाशदेव कहा गया लेकिन सच्चाई सिर्फ यही नहीं है।
कुछ इंसान थे, जो उन्हें देवता नहीं मानकर यह मानते थे
कि ये किसी अन्य धरती से आए लोग हैं और
हमारी धरती को बिगाड़ रहे हैं। बस, यहीं से मानव समुदाय में
दो फाड़ हो गई। एक वह जो उन्हें देवता और ईश्वर
का भेजा हुआ दूत मानते थे और दूसरे वे जो उन्हें 'एलियंस'
मानते थे।
आकाश से उतरे इन देवदूतों (धर्मग्रंथों और सभ्यताओं के
टैक्स अनुसार वे स्वर्गदूत थे) ने जब यहां की स्त्रियों के
प्रति आकर्षित होकर उनके साथ संभोग करना शुरू
किया तो उन्हें स्वर्ग से बहिष्कृत स्वर्गदूत कहा जाने
लगा। लेकिन वे लोग जो उन्हें 'धरती को बिगाड़ने का दोषी'
मानते थे उन्होंने उन्हें राक्षस कहना शुरू कर दिया।
बाद में लंबे काल तक इस बात को लेकर इंसानों में झगड़े
चलते रहे। दो गुट बने- पहले वे जो 'एलियंस' (आकाशदेव,
स्वर्गदूत या ईशदूत) के साथ थे और दूसरे वे जो उन्हें महज
दूसरे ग्रह का वासी मानते थे, लेकिन आज सब कुछ बदल
गया। वे लोग हार गए, जो उन्हें 'एलियंस' मानकर उनके
खिलाफ लड़ाई करते थे। अब सवाल यह उठता है कि वे
'हारे' हुए लोग कहां है? और जो जीत गए क्या उन्होंने
रक्त की शुद्धता बनाए रखी या एलियंस ने
उनकी जातियां भी नष्ट कर दीं और अब हम सभी इंसान
'एलियंस' की संतानें हैं?
इजिप्ट, मेसोपोटामिया, सुमेरियन, इंका, बेबीलोनिया, सिंधु
घाटी, माया, मोहनजोदड़ो और दुनिया की तमाम सभ्यताओं
के टैक्स में लिखा है कि जल्दी ही लौट आएंगे हमारे
'आकाशदेव' और फिर से वे धरती के मुखिया होंगे।
इजिप्ट और माया सभ्यता के लोग मानते थे कि अंतरिक्ष
से हमारे जन्मदाता एक निश्चित समय पर पुन: लौट आएंगे।
ओसाइशिरा (मिश्र का देवता) जल्द ही हमें लेने के लिए
लौट आएगा। तो क्या हम 'स्टार प्रॉडक्ट' हैं? और
क्या इसीलिए गिजावासी मरने के बाद खुद का ममीकरण
इसलिए करते थे ‍कि उनका 'आकाशदेव' उन्हें अंतरिक्ष में
ले जाकर उन्हें फिर से जीवित कर देगा?

वैज्ञानिकों ने कई सालों की रिसर्च के बाद यह
पता लगाया कि 'ओरायन' एक ऐसा नक्षत्र है
जिसका हमारी धरती से कोई गहरा संबंध है। भारतीय,
मिस्र, मेसोपोटामिया, माया, ग्रीक और
इंका आदि सभ्यताओं की पौराणिक कथाओं और तराशे गए
पत्थरों पर अंकित चित्रों में इस 'नक्षत्र'
संबंधी जो जानकारी है वह आश्चर्यजनक ढंग से एक
समान है। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे पूर्वज या कहें
कि हमें दिशा-निर्देश देने वाले लोग 'ओरायन' नक्षत्र से
आए थे।
अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी ने हबल दूरबीन के द्वारा इस
ओरायन तारामंडल के सटीक चित्र खींचे और बाद में वे
दुनियाभर में प्रचारित किए।
क्या है ओरायन कॉन्स्टलेशन (
orian constellation) :
भारत में 'ओरायन' नक्षत्र को 'मृगशिरा' कहा जाता है।
हिंदू धर्म में मार्गशीर्ष माह और मृगशिरा नक्षत्र बहुत
पवित्र माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष के नवम
माह का नाम मार्गशीर्ष है। इस माह को अगहन
भी कहा जाता है। सतयुग में देवों ने मार्गशीर्ष मास
की प्रथम तिथि को ही वर्ष प्रारंभ किया।
हमारे आकाश को वैज्ञानिकों ने 88 तारामंडलों में बांटा है।
भारतीय ज्योतिष ने 27 नक्षत्रों में बांटा है।
मृगशिरा नक्षत्र आकाश मंडल में पांचवां नक्षत्र है।
मृगशिरा का शाब्दिक अर्थ है मृग का शिर अर्थात हिरण
का सिर। मृगशिरा तारामंडल में
हमारी पृथ्वी जैसी हजारों पृथ्वियों के होने का अनुमान है।
ओरायन के तारे : हमारी धरती से 1500 प्रकाशवर्ष दूर
'ओरायन' तारामंडल में वैसे तो दर्जनों तारे हैं लेकिन
प्रमुख 7 तारे हैं। इस तारामंडल में तीन तेजी से चमकने
वाले तारे एक सीधी लकीर में हैं, जिसे
'शिकारी का कमरबंद' (ओरायन की बेल्ट) कहा जाता है।
सात मुख्य तारे इस प्रकार हैं- आद्रा (बीटलजूस), राजन्य
(राइजॅल), बॅलाट्रिक्स, मिन्ताक, ऍप्सिलन ओरायोनिस,
जेटा ओरायोनिस, कापा ओरायोनिस। इसमें आद्रा तारा,
राजन्य तारा और बॅलाट्रिक्स तारा सबसे कांतिमय और
विशालकाय है, जो धरती से स्पष्ट दिखाई देते हैं।
भारतीय मान्यता अनुसार : मृगशिरा नक्षत्र आकाश में
काफी फैला हुआ है। इसके तीन चमकीले छोटे तारे एक
सीधी रेखा में हैं और बड़े खूबसूरत हैं। उन्हें त्रिकांड कहते
हैं। उनके कारण मृग को पहचानना बहुत सरल है। त्रिकांड
के चारों ओर आयताकार चार तारे हैं और नीचे की ओर
तीन छोटे-छोटे तारे हैं। त्रिकांड की बाईं ओर व्याध
तथा दाईं ओर रोहिणी का बड़ा तारा है और ये पांच एक
सीधी रेखा में हैं। व्याध से थोड़ा ऊपर पुनर्वसु नक्षत्र के
चार चमकीले तारे हैं। पुनर्वसु, रोहिणी व आर्द्रा,
नक्षत्रों की पहचान भी कर सकते हैं।

इस समय देखें यह ग्रह-नक्षत्र : आजकल
मृगशिरा या ओरायन नक्षत्र सूर्यास्त के बाद से ही पूर्व-
दक्षिण क्षितिज में देखा जा सकता है। धीरे-धीरे ऊपर
आकर दूसरे दिन भोर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में इसके
एक-एक तारे ढलने लगते हैं। उनसे दोस्ती बढ़ानी है तो रात
में अलग-अलग समय उठकर देखते चलो कि ये आकाश में
कहां-कहां कैसे भ्रमण करते हैं।
एलियंस के एयरपोर्ट : इस तारामंडल के अनुसार
ही धरती पर भारत, चीन, इजिप्ट, ग्रीस, मैक्सिको, उत्तर
अमेरिका आदि जगहों पर शहर बने हैं और आश्चर्यजनक
रूप से हैलीपैड और एयरपोर्ट भी। ऐसे हैलीपैड जिस पर
शोध करते वक्त वैज्ञानिक हैरान रह गए कि आखिर इन्हें
कौन-सी टेक्नोलॉजी से बनाया गया होगा, क्योंकि यह
तो बस आज की आधुनिक टेक्नोलॉजी से ही संभव
हो सकता है।
इन्हें कैसे बनाया गया? यह विज्ञान के लिए आज भी एक
अबूझ पहेली है, क्योंकि कोई ऐसी तकनीक नहीं थी,
जो उस जमाने में इस 'एयरपोर्ट' को बना सकती थी। आज
की आधुनिक टेकनोलॉजी को भी इसे बनाने में
भारी मशक्कत करना पड़ेगी, तब उस काल के मानव के
लिए यह बनाना असंभव था। इसे कोई एलियंस
ही बना सकता है और वह भी रातोरात?
इंका सभ्यता के राजा से जब यह पूछा गया कि यह
विशालकाय और इतनी सुंदर तरीके से तराशी गई चट्टानें
कहां से आईं और इन्हें स्मारक जैसा रूप किसने
दिया तो राजा ने कहा कि यह मैंने नहीं बनवाई। आकाश से
कोई आया था जिसने ये बनाए और हमारे लिए छोड़कर चले
गए।
रातोरात पूरी सभ्यता कैसे खड़ी की जा सकती है? दक्षिण
अमेरिका के इस गुमनाम शहर का नाम है- 'पुम्मा पुंकु'। इस
शहर को 'एलियंस' ने बसाया और इसके पास महज 7 मील
की दूरी पर उन्होंने एक 'एयरपोर्ट' भी बनाया और वह
भी रातोरात।
रातोरात खड़े किए गए इस विशालकाय ढांचे का एक-एक
पत्थर 26 फीट ऊंचा और 100 टन वजनी है। ग्रेनाइट
पत्थर से बने यह एच (
H)
शैप के पत्थर 13 हजार फीट की ऊंचाई पर आखिर कैसे
ले जाए गए। एक या दो पत्थर नहीं, बल्कि सैकड़ों एच
ब्लॉक। वैज्ञानिकों ने जब इन पत्थरों पर शोध
किया तो पाया कि इतनी सफाई से बने ये पत्थर के ब्लॉक
हाथों से तो कतई नहीं बनाए जा सकते। यह
तो भौतिकी का बेहतर उदाहरण है। उनके होल्स और इनके
किनारे बिल्कुल सटीक बने हैं। यह किसी मशीनी टूल्स,
डायमंड टूल्स या लेजर से ही बन सकते हैं।
खोजकर्ताओं ने इसके कार्बन टेस्ट से पाया कि ये पत्थर
करीब 27 हजार वर्ष पुराने हैं। इन एच ब्लॉक के
पत्थरों का ग्राफ बनाकर उसका डाटा कंप्यूटर में फिट
किया गया और फिर से कंप्यूटर पर उसी तरह
जोड़ा गया जबकि उन्हें उस काल में जोड़ा गया था तो एक
विशाल प्लेटफॉर्म या कहें एयर ट्रैक बनता है,
जो विशालकाय जायंट एयरशटल के उतरने के लिए था।
लेकिन 1100 ई. पूर्व यह इलाका पूरी तरह से तबाह
हो गया। कैसे? बाढ़ से, युद्ध से, उल्का से या फिर अन्य
किसी कारण से।
सबसे खास बात जो शोध से पता चली कि इन्हें सात मील
दूर बनाकर यहां असेम्बल किया गया। कई शोधकर्ता इसे
मानते हैं कि इसे सुपर टेक्नोलॉजी के ‍जरिए
यहां लाया गया और ऐसा तो कोई एलियंस ही कर सकते हैं,
इंका सभ्यता के लोग या वहां के आदिवासी नहीं।
आखिर उन्हें रातोरात बनाने की जरूरत क्यों हुई? दरअसल
उनकी उड़नतश्तरी को उन्हें कहीं सुरक्षित लैंड
करना था और लैंड करने के बाद फिर से उन्हें वहां से
निकलना था। इसलिए उन्होंने एक लांच पैड के साथ
ही अपने लोगों के रहने के लिए एक स्थान (तिहूनाको)
भी बनाया। अंत में वे उन्हें ऐसा का ऐसा ही छोड़कर चले
गए।
जब उन्होंने एक छोटा गांव (तिहूनाको) बनाया तो उन्होंने
उसकी दीवारों पर अपने लोगों के चित्र भी बनाए और उनके
बारे में भी लिखा। तिहूनाको में काफी तादाद में
जो पत्थरों की दीवारें हैं उनमें अलग-अलग तरह के मात्र
गर्दन तक के सिर-मुंह बने हैं। ये सिर या स्टेचू स्थानीय
निवासियों ने नहीं हैं।
तिहूनाको के आदिवासी पुमा पुंकु में घटी असाधरण
घटना की याद में आज भी गीत गाते हैं। पुमा पुंका में
आकाश से देवता उतरे थे।
1549
में इंका सभ्यता के खंडहर पाए गए। पुमा पुंकु से
आधा किलोमीटर दूर एक नई सभ्यता मिली जिसे
तिहूनाको (
Tiwanaku, Bolivia)
कहा गया। तिहूनाको को जिन्होंने बसाया उन्होंने
ही पुमा पुंकु को बनाया।
सुमेरियन सभ्यता के टैक्स में भी इस जगह का जिक्र है,
जबकि सुमेरियन सभ्यता यहां से 13 हजार किलोमीटर दूर
है। सुमेरियन भी मानते हैं कि 'अनुनाकी' नाम का एक
देवता धरती पर उतरा था। यह अनुनाकी एलियंस 'ग्रे
एलियंस' की श्रेणी का एलियंस था।

यह सही है कि आज का आधुनिक विज्ञान उन्हें एलियंस
ही माने, लेकिन बाइबल में इन्हें 'नेफिलीम' कहा गया है
जिन्हें स्वर्ग से बाहर कर दिया गया था और जो धरती के
नहीं थे। ये स्वर्गदूतों के बच्चे थे। उनमें से एक शैतान था।
परमेश्वर ने स्वर्गदूतों को स्वर्ग में रहने के लिए
बनाया था, न कि धरती पर लेकिन वे सब धरती पर आ गए।
धरती पर वे इंसानों की औरतों की ओर आकर्षित होने लगे
और फिर वे अपनी मनपसंद औरतों के साथ रहने लगे। फिर
उनके भी बच्चे हुए और धीरे-धीरे उन्होंने धरती पर
अपना साम्राज्य फैलाना शुरू किया। सामान्य मानव उन्हें
या तो देवदूत कहता या राक्षस। इस तरह धरती पर एक नए
तरह का युग शुरू हुआ और नए तरह का संघर्ष भी बढ़ने
लगा और सभी तरफ एलियंस का ही साम्राज्य हो गया।
लोग रक्त शुद्धता पर जोर देने लगे।
भारतीय, मिस्र, ग्रीस, मैक्सिको, सुमेरू, बेबीलोनिया और
माया सभ्यता अनुसार वे कई प्रकार के थे जैसे आधे मानव
और आधे जानवर। इंसानी रूप में वे लंबे-पतले थे,
उनका सिर पीछे से लंबा था। वे 8 से 10 फीट के थे।
अर्धमानव रूप में वे सर्प, गरूढ़ और वानर जैसे थे। आपने
विष्णु का वाहन का चित्र देखा होगा। नागदेवता को कौन
नहीं जानता?
दूसरे वे थे जो राक्षस थे, जो बहुत ही खतरनाक और लंबे
और चौड़े थे। कुछ तो उनमें से पक्षी जैसे दिखते थे और
कुछ वानर जैसे। उनमें से कुछ उड़ सकते थे और समुद्र में
भीतर तल पर चल सकते थे। जब वे समुद्र के भीतर चलते
थे तो उनके सिर समुद्र के ऊपर दिखाई देते थे। उनमें
ऐसी शक्तियां थीं, जो आम इंसानों में नहीं थी। जैसे
पानी पर चलना, उड़ना, गायब हो जाना आदि।
शोधकर्ता मानते हैं कि उनमें से बचे कुछ 'एलियंस' आज
भी धरती पर मौजूद हैं। वे हमें इसलिए दिखाई नहीं देते है,
क्योंकि या तो में हिमालय की अनजान जगहों पर रहते हैं
या पाताल की गुप्त सुरंगों में। हमने कई लोगों को यह कहते
सुना है कि 'बिगफुट' देखा गया।
हालांकि शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि अंतरिक्ष से आए
'एलियंस' ने प्राचीन मानवों और खुद के जीन को मिलाकर
कई हाईब्रिड नस्लें बनाईं। उन्होंने इंसान ही नहीं, धरती के
जानवरों पर भी ये प्रयोग किए और अजीब-अजीब किस्म
के जानवर बनाए। आधे इंसान और आधे जानवर। आधे
जानवर और आधे दूसरे जानवर। 'एलियंस' यहां पर मिश्रित
प्रजातियों को जन्म देकर पुन: अपने ग्रह चले गए और
फिर समय-समय पर पुन: आकर यह देखते रहे कि आखिर
हमारी बनाई गई रचना का क्या हुआ।
भारत में सर्पमानव, वानरमानव, पक्षीमानव और इसी तरह
के अन्य मानवों की कथाएं मिलती हैं। चीन में पवित्र ड्रेगन
को स्वर्गदूत माना जाता हैं, जो चार हैं और ये
चारों ही समुद्र के बीचोबीच भूमि के अंदर रहते हैं।
इजिप्ट के पिरामिडों के टैक्स से पता चला कि ‍ओरायन से
आए थे देवता और उन्होंने ही धरती पर
जीवों की रचना की। इजिप्ट के लोग उन्हें अपना पूर्वज
मानते थे। तो क्या इंसान 'प्राचीन एलियंस' का वंशज है?
इजिप्शियंस मानते हैं कि 'ओरायन' ही हमारे अच्छे और बुरे
कर्मों का हिसाब-किताब रखते हैं और एक दिन हमें
उन्हीं के पास जाना है। इजिप्शियंस ने अपने उन
'आकाशदेव' को नाम दिया है ओसाइशिरा जिसे साइरस
भी कहा जाता था। उनके अनुसार एक दिन वे वापस लौट
आएंगे, क्योंकि वही हमारे जन्मदाता हैं। इजिप्शियंस मानते
हैं कि मानव जाति का जन्म तारों से हुआ है। इजिप्ट के
टैक्स से पता चला कि बादशाह हुनस सचमुच ही अंतरिक्ष
में गए थे और लौट आए थे। बादशाह 'ओरायन' के
नक्षत्रों के तारों में किसी से मिलने जाते थे।
गीजा के तीन पिरामिड 'ओरायन' नक्षत्र के तीन तारों के
ठीक नीचे बने हैं और कुल प्रमुख सात पिरामिड हैं। उस पूरे
क्षेत्र की रचना इस प्रकार है जैसी कि आकाश में उन
तारों की आपसी दूरी दिखाई देती है। पिरामिड के रिसर्च से
पता चला कि ओरायन नक्षत्र की ओर इंगित करते ये तीन
पिरामिड आश्चर्यजनक रूप से ओरायन से जुड़े हैं।
अंतरिक्ष से देखने पर लगता है कि यह ओरायन नक्षत्र है।
इसी तरह के धरती पर और भी कई स्थान हैं, जो ओरायन
से अलायमेंट हैं।
डिस्कवरी और हिस्ट्री चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक
'चैरियोट्स ऑफ गॉड्स' के मशहूर लेखक एरिक वोन
डेनीकेन का मानना है कि प्राचीन मिस्र के निवासियों के
पास गीजा के पिरामिडों को बनाने की कोई तकनीक
नहीं थी। मिस्र के निवासियों के पास गीजा में पिरामिड
बनाने के लिए न तो औजार थे, न ही इन्हें बनाने का ज्ञान
था। इस तरह इन्हें अवश्य ही एलियंस ने बनाया होगा।
मध्य अमेरिका के माया पिरामिड और पेरू के
नाजका मरुस्थल में बनी चित्रकारी के बारे में भी इसी तरह
के दावे किए गए हैं। गीजा से हजारों किलोमीटर उत्तर
अमेरिका के नाफ्टा के स्टोन्स। यहां रेगिस्तान में तीन
पत्थरों के आसपास पांच और हैं, जो ओरायन को इंगित
करते हुए बनाए गए हैं।
1974
में इस स्थान की खोज की गई जिसे डेजर्स का मिनिस्टोन
कहा जाता है। उनकी बनावटों से पता चलता है कि उन्हें
फिजिस्स-एस्ट्रोलॉजी की जबरदस्त जानकारी थी।
यहां तीन स्टोन में से सर्कल स्टोन के पास के पत्थर
को केंडल सर्कर स्टोन कहा जाता है दूसरे को ब्लैक
मिसा।
ये करीब 7 हजार ईसा पूर्व बनाए गए थे, लेकिन क्यों?
पहले यहां लोग रहते थे। बाद में कुछ कारणवश वे लोग
यहां से 100 किलोमीटर दूर जाकर बस गए। इन
लोगों को 'स्टार पीपल' कहा जाता है, जो ओरायन के
आदेशों अनुसार धरती पर अपने रहने की जगह बनाते थे।
उनके अनुसार अंतरिक्ष से जब वे आते थे तो धरती पर दूर
से ही उन्हें वह स्थान दिखाई दे जाता था, जहां उन्हें
उतरना है और एक दिन वे अपने यान के साथ पुन: लौटकर
देखेंगे की उनकी संतानों का क्या हुआ।
एरिजोना के 15 लाख एकड़ में फैले डेजर्ट में हजारों ऐसे
गाव हैं, जो 'ओरायन' तारों की ओर इंगित करते हैं। इसी में
से एक होपी लैंड है, जहां ओरायन के तीन तारों को इंगित
करती तीन चट्टानें हैं। उन तीन के आसपास चार और हैं,
सेंटर में तीन। होपी रेड इंडियन लोग अपने देवता को मसाऊ
कहते थे यह उनकी ही याद में बने हैं या इसे उनके (मसाऊ)
इशारों पर ही बनाया गया।
रेगिस्तान में उनका देवता मसाऊ उन्हें जगह
बताता था कि कहां गांव बनाने हैं और इस तरह धरती पर
'ओरायन' तारों का एक पूरा बेल्ट बना लिया गया।
इनकी दूरियों को आपस में जोड़ने पर 'शिकारी तारामंडल'
बनता है। यह जमीनी नक्शा ओरायन के बेल्ट से मेल
खाता है।
भारतीय पौराणिक शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि कई
देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। क्यों?
उनकी हरकतों के चलते उन्हें कोई न कोई ऋषि या भगवान
श्राप दे देता था और फिर उन्हें धरती पर दिन गुजारने होते
थे। ये देवता भी कई प्रकार के होते थे। कोई वानर रूप में,
कोई सर्प रूप में तो कोई राक्षस रूप में।
पौराणिक ग्रंथों में देव और दानवों की जो कथाएं मिलती हैं,
वे स्वर्ग और धरती से जुड़ी हुई हैं। नारद नाम के एक देव
दोनों लोक के संदेशवाहक थे। और भी कई संदेश वाहक थे,
लेकिन वे सबसे प्रसिद्ध थे।
विष्णु भगवान (जो एक एलियंस थे प्राचीन एस्ट्रॉनॉमी के
अनुसार) ने अपने दोनों पार्षदों (जय और विजय) को वैकुंठ
से निकाल दिया था। क्यों? क्योंकि उन्होंने सदा अंतरिक्ष
में विचरण करने वाले चार कुमार को वैकुंठ में आने से रोक
दिया था तो उन्हें चारों कुमारों का श्राप झेलना पड़ा और
फिर उन्होंने धरती पर हिण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप
में जन्म लिया।
भगवान् विष्णु का प्रथम अवतार चार कुमारों के रूप में
हुआ- पहले कौमारसर्ग में सनक, सनंदन, सनातन और
सनत्कुमार। ये चार कुमार शाश्वत मुक्तात्मा हैं,
जो अंतरिक्ष में कहीं भी आ-जा सकते थे। इनकी आयु बहुत
अधिक होने पर भी ये पांच वर्ष के बालकों जैसे ही लगते हैं
और इन्हें देवताओं का पूर्वज माना जाता है। 'अवतार' शब्द
भी अपने आप में किसी दूसरे लोक की ओर इशारा करता है।
दूसरी ओर प्राचीन एस्ट्रोनॉमी के शोधकर्ता मानते हैं
कि भारत के पौराणिक ग्रंथों में जिस यति का उल्लेख
मिलता है वह 'एलियंस' ही रहा होगा। वेदों में इंसानों के
अलावा धरती पर देव, दानव, राक्षस, गंधर्व, किन्नर और
यति रहते थे।
शोधकर्ताओं ने पाया कि भारत में 'विजय नगर साम्राज्य'
सर्पदेव से संबंध रखने वाले लोगों ने बसाया था। भारत में
जिस नागदेव की पूजा की जाती है, जो आधा मानव और
आधा सर्प है निश्चय ही वह 'एलियंस'
रहा होगा या ओरायन से आए एलियंसों ने अपने जीन से इस
तरह के कई जीव-जंतु बनाए। हां, इसके कई सबूत हैं
कि एलियंस ने आधे मानव और आधे जानवर जैसे जीव
बनाए थे।
माना जाता है कि गुरु और शुक्र ग्रह पर पहले लोग रहते
थे। गुरु ग्रह के लोगों ने मंगल को अपनी सैन्य
छावनी बनाया था तो शुक्र ग्रह के लोगों ने चंद्र को। चंद्र
और मंगल ग्रह पर उनके अंतरिक्ष यानों की देखरेख और
युद्ध की ट्रेनिंग होती थी। गुरु ग्रह के शासक
ऋषि बृहस्पति थे और शुक्र ग्रह के शुक्राचार्य। आज
देखा जाए तो कुछ धर्म ऐसे हैं जो शुक्र और चंद्र को अपने
धर्म में महत्वपूर्ण स्थान देते हैं और कुछ में गुरु और मंगल
का महत्वूर्ण स्थान है।
महाभारत, रामायण और वेद में ऐसे कई लोगों का जिक्र
है, ‍जो हमारे ग्रह के नहीं थे।